राष्ट्रीय एकता के प्रतीक हैं द्वादश ज्योतिर्लिंग, शिव महापुराण कथा का पूर्णाहूति के साथ समापन, संत दिव्य मोरारी बापू ने बताया द्वादश ज्योतिर्लिंग के दर्शन और स्मरण का महत्व

लालसोट. स्थानीय श्री रामकृष्ण गायत्री माता मंदिर में आयोजित नौ दिवसीय श्रीशिवमहापुराण कथा का रविवार को पूर्णाहूति के साथ भव्य समापन हो गया। कथा व्यास महामंडलेश्वर संत दिव्य मोरारी बापू ने अंतिम दिन शिवमहापुराण की कोटिरूद्र संहिता में वर्णित द्वादश ज्योतिर्लिंग की महिमा का भावपूर्ण वर्णन किया। संत दिव्य मोरारी बापू ने कहा कि भगवान शंकर के बारह ज्योतिर्लिंग देश के किसी एक प्रांत में न होकर भारतवर्ष के अलग-अलग क्षेत्रों में स्थापित हैं, जो कि हमारी राष्ट्रीय एकता के प्रतीक भी है, द्वादश ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने मात्र से ही संपूर्ण भारतवर्ष के दर्शन हो जाते हैं। भगवान चारों दिशाओं में व्याप्त हैं और वे सच्ची भावना से पुकारने पर प्रकट होते हैं; इसी सत्य को स्पष्ट करने के लिए परमात्मा चारों दिशाओं में ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए हैं। बापू ने ने कहा कि प्रत्येक मनुष्य को जीवन में कम से कम एक बार द्वादश ज्योतिर्लिंग के दर्शन अवश्य करने चाहिए। यदि प्रत्यक्ष दर्शन संभव न हो, तो घर बैठे ही इनका श्रद्धापूर्वक स्मरण और पूजन कर लेना चाहिए। वर्ष के बारह मास और जीवन चक्र इसी संवत्सर पर आधारित हैं। दस इंद्रियों और एक मन से जाने-अनजाने में हुए पापों के निवारण के लिए एकादश रुद्र और द्वादश ज्योतिर्लिंग का स्मरण विशेष फलदायी माना गया है। कथा के दौरान शिवपुराण के अनुसार बारह ज्योतिर्लिंग सोमनाथ,मल्लिकार्जुन,महाकाल,ओंकारेश्वर, केदारेश्वर,भीमेश्वर, काशी बाबा विश्वनाथ,त्रर्यंबकेश्वर, वैद्यनाथ,नागेश्वर, रामेश्वर एवं घुश्मेश्वर महादेव की महिमा और कथा का विस्तार से वर्णन किया गया। कथा के समापन अवसर पर मुख्य आरती एवं हवन-पूर्णाहूति का आयोजन किया गया। कथा के दौरान भजनों पर महिलाएं जम कर झूमी।
